Fertility Enhancing Treatment

Fertility Treatment

नि:संतानता - SUBFERTILITY

Fertility Enhancing Treatment

जब स्त्री मानसिक या शारीरिक तनाव महसूस करती है, तब शरीर में कुछ हार्मोन के स्तरो में बदलाव आता है, जिसके परिणाम स्वरूप परिपक्व डिंबोत्सर्ग ( ovulation ) में बाधा आती है। यह हार्मोन गर्भाशय की अंतःरचना में कुछ ऐसे बदलाव लाते है जिससे भ्रुण की स्थापना हो नही पाती। अगर गर्भ ठहर जाता है तो उसका विकास नही हो पाता है। यह एक चक्रव्यूह की तरह है।

आधुनिक युग की भागदौड़ में निसंतानता की समस्या कई दंपतियों को परेशान कर रही है । सही परामर्श एवं इलाज के चलते इससे निजात पाना अब कठिन नहीं है।

बांझपन का सही मतलब

एक साल या उससे अधिक समय तक बिना किसी गर्भनिरोधक उपयोग किये, पति- पत्नी शारीरिक संबंध रखते हैं, फिर भी पत्नी को गर्भ नही ठहरता, इस अवस्था को बाँझपन या सबफर्टिलीटी कहते है। बाॉंझपन के लिये स्त्री एवं पुरुष समान रूप से जिम्मेदार हो सकते है।

डॉक्टरी सलाह कब ले

यदि आप एक साल के प्रयत्न के बाद भी सफल नहीं हो रहे है और चिंता करने लगे है, तो डॉक्टरी सलाह ले लीजिये। हो सकता है, यह
जल्दबाजी हो, पर चिंता से मुक्त होना, गर्भधारन में सहायक होगा। 35 साल के उपर की महिलाओं को 6 महिने प्रयत्न करने के बाद ही डाॅकटर की सलाह लेनी चाहिए।

अपने को इस समस्या के संदर्भ में अकेला न मानें। बहुत युगलों का इन समस्या से वास्ता पड़ता है और अधिकांश इसे सुलझाने में समर्थ हो जाते है। 
दुर्भाग्यवश महत्वपूर्ण समस्या होते हुये भी “यह अत्यंत जरूरी नहीं है। ऐसा मानकर युगल डॉक्टर के पास जाना टालते रहते है। समय के तो पंख लगे है और जब तक युगल डॉक्टर के पास पहुंचता है काफी देर हो सकती है। कुछ ऐसी समस्याए भी हो सकती है, जब डॉक्टरी सलाह जल्दी लेनी चाहिये।

पुरुष परीक्षाण

वीर्य विश्लेषण
अन्य – हार्मोन्स स्तर, सोनोग्राफी डॉप्लर, अंडकोष बायोप्सी

स्त्री का परीक्षण

* हार्मोन्स स्तर की जांच
*ध्वनि चित्र – अल्ट्रासाउंड-फॉलिकल स्टडी, Antral follicle count
*हिस्टेरोसल्पिंगग्राफी (HSG)
*लेपरोस्कोपी  एक सबसे महत्वपूर्ण आपरेशन है!
*हिस्टेरोस्कोपी – गर्भाशय की भीतरी भाग की जाँच एवं आपरेशन है।

क्या वर्तमान काल में प्रजनन क्षमता में कमी हुई है?

शायद हाँ! इसके कारण है –
* स्त्रियों को देर से शादी करना और संतान प्राप्ति – fertility के लिये और भी देरी करना।
* लैंगिक बीमारियों का बढ़ना, जिसके कारण नर नारी दोनों की प्रजनन क्षमता में कमी आती ही है।

*शुक्राणुओं की संख्या में कमी। यह आज पूरे संसार की समस्या है। यह दूषित वातावरण के कारण है या आज की तनाव भरी जिंदगी के कारण भी ऐसा हो सकता है। 
*फिर भी खुशी की बात है कि आज लोग इस ओर जागरूक हुये है और अब बांझपन छिपाने की बात नही मानी जाती, बल्कि सारा परिवार इसमें उत्सुकता से डॉक्टरी सलाह लेता हैं।  

इंट्रायूटेराइन इनसेमिनेशन- IUI

कभी-कभी गर्भाधान के लिये प्रकृति को सहायता की जरूरत होती है और डॉक्टर यह मदद दे सकते है- एक पतली नलिका में शुक्राणु लेकर नारी के गर्भाशय में पहुँचा देते है। यह विधि पति के शुक्राणु का पत्नी के अंडे से मिलन के अवसर बढा देती है। आई यू आई की सफलता कई बातों पर निर्भर है। वंदध्यता का कारण यदि संभोग न कर पाना ही है तो ज्यादा सफलता मिलती है, उसके बाजाय जहाँ शुक्राणु की संख्या की कमी हो, औरत 35 वर्ष से ज्यादा आयु की हो, तो सफलता कम हो जाती है। गर्भधारण 6 माह तक प्रयत्न करने में  हो सकता है, नही तो यह तरीका उपयुक्त नहीं मान लेना चाहिये।

अंडाशय में अंडाणु बनने के लिये कुछ दवा माहवारी के दुसरे दिन से दी जाती है। 9-10 वे दिन से सोनोग्राफी द्वारा अंडाणु बना है यह देखा जाता है, अंडाणू 18-20 mm का होने पर उसे बीज निकलने के लिये इंजेक्शन लगाया जाता है। सोनोग्राफी के लिये 4-5 बार आना होता है। Ovulation (अंडाणू से बीज निकलना) के लिए hcg trigger इंजेक्शन देने के 24-36 घंटे बाद IUI किया जाता है।

वीर्य परीक्षण करके उसे लेबोरेटरी में प्रोसेस किया जाता है ताकि वीर्य की गुणवत्ता बढे। इससे गर्भवती होने की संभावना 10 से 26 प्रतिशत बढती है। इसे 6 से 8 बार तक करवा सकते है। IUI के बाद उठने बैठने, काम करने सहवास करने में कोई परहेज नही होता है 14-15 दिन के बाद हमें urine pregnancy test करने से IUI का रिजल्ट पता चलता है।

टेस्ट ट्यूब सन्तति - IVF/ICSI

वंध्यत्व के उपचार की एक बड़ी उपलब्धि है-1978 में आई बी एफ पद्धति के द्वारा लुई ब्राउन का जन्म। उसके बाद नये नये और तरीके भी ईजाद हो बात होते गयॆ। 20 साल में ही आई वी एफ का प्रयोग एक सामान्य बात हो गई है | आई वी एफ – पदधति मे संसेचन शरीर के बाहर होता है | शुक्राणु व अंडे का मिलन प्रयोगशाला की एक तश्तरी में करवाया जाता है और परिणामस्वरूप प्राप्त हुये भ्रूण को गर्भाशय में रख दिया जाता है। इस पधति की पाँच सीढिया इस तरह है – अंडे का बढाना, अंडे प्राप्त करना, संसेचन, भ्रूण का विकास और भ्रूण प्रत्यारोपण । पुरुष की समस्यानुसार TESA ICSI/PESA ICSI का हम उपयोग कर सकते है।

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